परम्परागत योग शास्त्र की भूमिका (मौलिक रूपांतरण)

परम्परागत योग शास्त्र की भूमिका (मौलिक रूपांतरण)

योग की परम्परा मानव सभ्यता जितनी ही प्राचीन मानी जाती है। योग केवल अभ्यासों का समूह नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण सृष्टि की मूल संरचना—प्रकृति और पुरुष  —के पारस्परिक संबंध की अभिव्यक्ति है। जहाँ प्रकृति जड़ है, वहीं पुरुष चेतन तत्व है। इन दोनों के संयोग से ही सृष्टि का विकास और जीवन की गति संभव होती है।

प्रकृति अपने आप में क्रियाशील नहीं होती, किंतु जब वह चेतन ( आत्मा ) पुरुष के संपर्क में आती है, तब उसमें अभिव्यक्ति की शक्ति जाग्रत होती है। इसी संयोग से जीव का जन्म और विकास होता है। सामान्य व्यक्ति इन दोनों तत्वों को अलग-अलग नहीं पहचान पाता, क्योंकि वे अत्यंत सूक्ष्म रूप से एक-दूसरे में संयुक्त रहते हैं।

प्रकृति दृश्य है—जिसे देखा जा सकता है—और पुरुष दृष्टा है—जो देखने वाला है। जीव के भीतर स्थित आत्म तत्व ही वास्तव में पुरुष है, जिसने अपने कर्मों के संपादन हेतु प्रकृति को माध्यम के रूप में ग्रहण किया है। अतः जीव का वास्तविक स्वरूप उसका शरीर या मन नहीं, बल्कि वही चैतन्य आत्मा है।

मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, शरीर और इन्द्रियाँ—ये सभी प्रकृति और पुरुष के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न होते हैं। इनमें चित्त सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही वह आधार है जहाँ एक ओर सांसारिक वासनाएँ जन्म लेती हैं और दूसरी ओर यही चित्त पुरुष की ओर उन्मुख होकर मुक्ति का मार्ग भी दिखाता है।

चित्त की यह द्वैध शक्ति ही अविद्या और विद्या कहलाती है।
अविद्या जीव को भोगों और संसार में उलझाए रखती है, जबकि विद्या के जाग्रत होने पर वही चित्त मनुष्य को आत्मज्ञान और मुक्ति की ओर ले जाता है। जब अविद्या का क्षय हो जाता है, तब विद्या से उत्पन्न संस्कार दृढ़ हो जाते हैं और जीव प्रकृति से अपने बंधन को समाप्त कर लेता है।

इस अवस्था में आत्मा प्रकृति से पृथक होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाती है। यही अवस्था कैवल्य या मोक्ष कहलाती है।

योग दर्शन उन समस्त साधनों और विधियों का विस्तार से वर्णन करता है, जिनके माध्यम से साधक अपने भीतर के प्रकृतिजन्य विकारों को दूर कर आत्मतत्त्व की अनुभूति कर सकता है। इसके लिए शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और अहंकार—सभी का क्रमशः शोधन आवश्यक है।

इन सभी साधनों का मूल उद्देश्य एक ही है—
👉 चित्त की वृत्तियों का निरोध।

इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए योग के आठ अंग बताए गए हैं—
यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

इन आठों अंगों का विधिपूर्वक अभ्यास करने से साधक उस परम अवस्था को प्राप्त करता है, जहाँ वह अपने वास्तविक आत्मस्वरूप में स्थित हो जाता है।

महर्षि पतंजलि इसी सनातन परम्परा को आधार बनाकर योग दर्शन का प्रारम्भ करते हैं और प्रथम सूत्र में संकेत देते हैं कि अब इस अनुशासनात्मक योग शास्त्र की व्याख्या आरम्भ की जा रही है—एक ऐसा अनुशासन, जो मनुष्य को चित्तवृत्ति निरोध के माध्यम से आत्मबोध तक ले जाता है।

यदि आप पतंजलि के योगदर्शन को मूल ग्रंथ से पढ़ना चाहते हैं और गहराई से समझना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके अध्ययन में अत्यंत सहायक होगी —
👉 यहाँ देखें:

नोट: यह लेख योगदर्शन की मौलिक व्याख्या पर आधारित है। विस्तृत अध्ययन के लिए मूल ग्रंथ/पुस्तक का संदर्भ उपयोगी रहेगा।


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