धारणा क्या है? योग में एकाग्रता की शक्ति को समझें
धारणा का सरल अर्थ
योग के अनुसार धारणा का मतलब है — मन या चित्त को किसी एक स्थान पर स्थिर करना।
जब मन इधर-उधर भटकना छोड़कर किसी एक बिंदु पर टिक जाता है, उसी अवस्था को धारणा कहा जाता है।
यह स्थान शरीर के अंदर भी हो सकता है और बाहर भी।
जैसे — नाभि, हृदय, कंठ, भृकुटि या नाक का अग्र भाग।
इसी तरह सूर्य, चन्द्रमा या किसी तारे पर भी मन को केंद्रित किया जा सकता है।
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योग के आठ अंग और धारणा
योग दर्शन में साधना के आठ मुख्य अंग बताए गए हैं।
इनमें शुरुआती पाँच अंग साधक को बाहरी अनुशासन और शुद्धि के लिए तैयार करते हैं।
जब इन पाँच अंगों में अभ्यास मजबूत हो जाता है, तब साधक की मानसिक चंचलता काफी हद तक शांत हो जाती है।
इसके बाद साधना का अगला चरण शुरू होता है, जिसे अंतरंग साधना कहा जाता है।
इस अंतरंग साधना में तीन अवस्थाएँ आती हैं:
धारणा
ध्यान
समाधि
ये तीनों एक ही प्रक्रिया के क्रमिक चरण माने जाते हैं।
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धारणा क्यों आवश्यक है
मन की स्वाभाविक प्रवृत्ति है भटकना।
यह लगातार विचारों, इच्छाओं और स्मृतियों के बीच घूमता रहता है।
जब साधक अभ्यास और अनुशासन के माध्यम से मन को नियंत्रित करना सीख लेता है, तब वही मन एक शक्तिशाली साधन बन जाता है।
पहले यही मन संसार के भोग और इच्छाओं में लगा रहता है, लेकिन साधना के बाद उसी शक्ति का उपयोग आत्मिक उन्नति के लिए किया जाता है।
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धारणा का अभ्यास कैसे होता है
धारणा के अभ्यास में साधक अपने मन को किसी एक बिंदु पर स्थिर रखने का प्रयास करता है।
यह बिंदु कई प्रकार के हो सकते हैं, जैसे:
नाभि केंद्र
हृदय क्षेत्र
भृकुटि (दोनों भौंहों के बीच)
नाक का अग्र भाग
सूर्य या चन्द्र का ध्यान
जब मन बार-बार उसी स्थान पर लौटकर स्थिर होने लगता है, तब धीरे-धीरे उसकी चंचलता कम होने लगती है।
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धारणा के लाभ
नियमित धारणा अभ्यास से कई परिवर्तन होते हैं:
मन की अशुद्धियाँ कम होती हैं
मानसिक भटकाव धीरे-धीरे समाप्त होता है
एकाग्रता बढ़ती है
ध्यान में प्रवेश करना आसान हो जाता है
इसी प्रक्रिया के माध्यम से साधक आगे चलकर ध्यान और समाधि की अवस्था तक पहुँच सकता है, जो अंततः आत्मिक मुक्ति की ओर ले जाती है।
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