चित्त वृत्ति क्या है? — योग दर्शन में मन की गतिविधियों को समझिए | What is Chitta Vritti in Yoga
योग दर्शन में मन को समझना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। मन ही वह माध्यम है जिसके द्वारा हम संसार का अनुभव करते हैं, सोचते हैं, निर्णय लेते हैं और प्रतिक्रिया करते हैं। लेकिन यही मन जब अस्थिर हो जाता है, तब वह दुःख और अशांति का कारण बनता है।
महर्षि पतंजलि के प्रसिद्ध ग्रंथ योगसूत्र का पहला और सबसे प्रसिद्ध सूत्र है:
योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।
अर्थात —
चित्त की वृत्तियों का निरोध (रुकना या शांत होना) ही योग है।
इस सूत्र को समझने के लिए पहले हमें यह समझना होगा कि चित्त वृत्ति क्या है।
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चित्त क्या है?
योग दर्शन में चित्त का अर्थ है मन की पूरी आंतरिक संरचना। इसमें तीन प्रमुख तत्व शामिल होते हैं:
मन (Mind) – विचार और संकल्प-विकल्प करने वाला भाग
बुद्धि (Intellect) – निर्णय लेने वाला भाग
अहंकार (Ego) – “मैं” की भावना
इन तीनों का संयुक्त रूप चित्त कहलाता है।
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वृत्ति क्या है?
वृत्ति का अर्थ है लहर या गतिविधि।
जैसे पानी में लहरें उठती हैं, उसी प्रकार चित्त में विचार, कल्पनाएँ, भावनाएँ और स्मृतियाँ उठती रहती हैं। इन्हीं को चित्त वृत्ति कहा जाता है।
सरल शब्दों में
चित्त में उठने वाली हर मानसिक गतिविधि — चित्त वृत्ति है।
चित्त वृत्तियों के पाँच प्रकार
पतंजलि ने चित्त वृत्तियों को पाँच प्रकार में विभाजित किया है:
1. प्रमाण (सही ज्ञान)
जब हमें किसी वस्तु का सही ज्ञान होता है, उसे प्रमाण कहते हैं।
यह तीन प्रकार से प्राप्त होता है:
प्रत्यक्ष (सीधे अनुभव से)
अनुमान (तर्क से)
आगम (शास्त्र या गुरु से)
2. विपर्यय (गलत ज्ञान)
जब किसी वस्तु को गलत तरीके से समझ लिया जाए, उसे विपर्यय कहते हैं।
उदाहरण:
अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना।
3. विकल्प (कल्पना)
जब किसी शब्द या विचार के आधार पर कल्पना की जाती है, उसे विकल्प कहते हैं।
उदाहरण:
किसी ऐसी चीज़ की कल्पना करना जो वास्तव में मौजूद न हो।
4. निद्रा (नींद)
योग दर्शन के अनुसार नींद भी एक प्रकार की चित्त वृत्ति है।
नींद में भी मन पूरी तरह समाप्त नहीं होता, बल्कि वह एक विशेष अवस्था में होता है।
5. स्मृति (Memory)
जब पिछले अनुभव मन में सुरक्षित रहते हैं और समय-समय पर याद आते हैं, तो इसे स्मृति कहते हैं।
स्मृतियाँ हमारे व्यवहार और सोच को गहराई से प्रभावित करती हैं।
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चित्त वृत्तियाँ समस्या क्यों बनती हैं?
जब चित्त में लगातार विचारों और भावनाओं की लहरें उठती रहती हैं, तब मन अशांत हो जाता है।
इसके कारण:
तनाव बढ़ता है
निर्णय स्पष्ट नहीं होते
ध्यान केंद्रित नहीं हो पाता
व्यक्ति वर्तमान क्षण में नहीं रह पाता
इसलिए योग का उद्देश्य है —
चित्त वृत्तियों को शांत करना।
चित्त वृत्ति निरोध कैसे करें?
योग दर्शन में इसके लिए कई साधन बताए गए हैं:
1. अभ्यास (Practice)
नियमित ध्यान और योग का अभ्यास मन को स्थिर करता है।
2. वैराग्य (Detachment)
आसक्ति कम होने से मन की लहरें शांत होने लगती हैं।
3. ध्यान (Meditation)
ध्यान चित्त को एकाग्र बनाता है और वृत्तियों को कम करता है।
4. प्राणायाम
श्वास को नियंत्रित करने से मन भी शांत होता है।
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चित्त वृत्ति शांत होने पर क्या होता है?
जब चित्त की वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं, तब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को अनुभव करता है।
पतंजलि कहते हैं:
तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।
अर्थात —
तब देखने वाला (आत्मा) अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है।
यही योग का अंतिम उद्देश्य है।
योग दर्शन के अनुसार चित्त की वृत्तियाँ ही मन की अशांति का कारण हैं।
जब साधक अभ्यास, वैराग्य और ध्यान के माध्यम से इन वृत्तियों को शांत करता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है।
चित्त की लहरें शांत होने पर ही चेतना का वास्तविक स्वरूप प्रकट होता है।
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