अस्मिता क्या है? — योग दर्शन में अहंकार और “मैं” की भावना को समझें

अस्मिता क्या है? — योग दर्शन में अहंकार और “मैं” की भावना को समझें


योग दर्शन में “अस्मिता” एक महत्वपूर्ण शब्द है। पतंजलि योगसूत्र में इसे मनुष्य के दुखों का एक बड़ा कारण बताया गया है। साधारण भाषा में अस्मिता का अर्थ है — “मैं” की भावना, अर्थात स्वयं को शरीर, मन, विचार या पहचान मान लेना।

जब व्यक्ति अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूलकर केवल अपने अहंकार, नाम, पद, शरीर या विचारों से जुड़ जाता है, तब अस्मिता उत्पन्न होती है।


पतंजलि योगसूत्र में अस्मिता

पतंजलि योगसूत्र में पाँच क्लेश बताए गए हैं:

अविद्या

अस्मिता

राग

द्वेष

अभिनिवेश

इनमें अस्मिता दूसरा क्लेश है।

योगसूत्र

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता ॥

अर्थात — देखने वाले (आत्मा) और देखने की शक्ति (मन-बुद्धि) को एक मान लेना ही अस्मिता है।


अस्मिता का सरल अर्थ

जब हम कहते हैं:

“मैं बहुत महान हूँ”

“मैं सबसे बेहतर हूँ”

“मेरी बात ही सही है”

“मुझे कोई गलत नहीं कह सकता”

तो यह अस्मिता का रूप हो सकता है।

अस्मिता केवल घमंड ही नहीं है, बल्कि स्वयं को सीमित पहचान से जोड़ लेना भी अस्मिता है।

जैसे:

मैं शरीर हूँ

मैं केवल यह नाम हूँ

मैं केवल यह पद हूँ

मैं अपने विचार ही हूँ

योग के अनुसार यह वास्तविक सत्य नहीं है।


अस्मिता कैसे पैदा होती है?

अस्मिता की जड़ अविद्या (अज्ञान) है।

जब व्यक्ति अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को नहीं जानता, तब वह बाहरी चीजों से अपनी पहचान बना लेता है।

उदाहरण:

धन से पहचान

सुंदरता से पहचान

सोशल मीडिया प्रसिद्धि से पहचान

जाति, पद या शक्ति से पहचान

धीरे-धीरे यही पहचान “मैं” बन जाती है।


अस्मिता के लक्षण

यदि व्यक्ति में अस्मिता अधिक हो तो वह:

हर बात में स्वयं को सही मानता है

आलोचना सहन नहीं कर पाता

जल्दी क्रोधित हो जाता है

दूसरों को छोटा समझता है

अपनी छवि बचाने में लगा रहता है

हमेशा प्रशंसा चाहता है


क्या आत्मविश्वास भी अस्मिता है?

नहीं।

आत्मविश्वास और अस्मिता अलग बातें हैं।

आत्मविश्वास

अस्मिता

शांत होता है

तुलना करता है

भीतर से आता है

बाहरी पहचान पर आधारित

विनम्र बनाता है

अहंकार बढ़ाता है

स्थिर होता है

जल्दी आहत हो जाता है


आध्यात्मिक मार्ग में अस्मिता बाधा क्यों है?

अस्मिता व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप से दूर रखती है।

जब तक “मैं” और “मेरा” की पकड़ मजबूत रहती है, तब तक मन शांत नहीं होता।

ध्यान में भी अस्मिता बाधा बनती है क्योंकि व्यक्ति हर अनुभव को “मैं कर रहा हूँ” से जोड़ देता है।

योग कहता है:

साक्षी बनो

देखने वाले बनो

विचारों से अपनी पहचान मत बनाओ


अस्मिता को कम कैसे करें?

1. साक्षी भाव का अभ्यास करें

अपने विचारों और भावनाओं को केवल देखें।

सोचें:

“यह विचार है, लेकिन मैं विचार नहीं हूँ।”


2. ध्यान करें

ध्यान मन को शांत करता है और “मैं” की पकड़ को धीरे-धीरे कमजोर करता है।


3. विनम्रता विकसित करें

हर व्यक्ति से कुछ सीखने का भाव रखें।


4. सेवा भाव रखें

निस्वार्थ सेवा अहंकार को कम करती है।


5. आत्मचिंतन करें

अपने भीतर देखें:

क्या मुझे हमेशा प्रशंसा चाहिए?

क्या आलोचना से दुख होता है?

क्या मैं स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानता हूँ?

यह जागरूकता अस्मिता को कमजोर करती है।


योग में असली पहचान क्या है?

योग दर्शन के अनुसार मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शुद्ध चेतना है।

हम शरीर, विचार और अहंकार से परे हैं।

जब व्यक्ति इस सत्य को अनुभव करता है, तब अस्मिता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है और भीतर शांति उत्पन्न होती है।


अस्मिता केवल अहंकार नहीं, बल्कि गलत पहचान है।
जब हम स्वयं को शरीर, विचार, पद या नाम तक सीमित कर लेते हैं, तब दुख पैदा होता है।

योग और ध्यान का उद्देश्य अस्मिता को मिटाकर व्यक्ति को उसके वास्तविक आत्मस्वरूप का अनुभव कराना है।

साक्षी भाव, ध्यान और जागरूकता के माध्यम से अस्मिता धीरे-धीरे कम होने लगती है और जीवन में शांति, संतुलन और आत्मज्ञान आने लगता है।

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