भगवान शिव की दूसरी ध्यान विधि – श्वास के अंत और आरंभ के मध्य स्थित मौन का अनुभव
भगवान शिव द्वारा बताए गए 112 ध्यान सूत्रों में दूसरी ध्यान विधि भी श्वास पर आधारित है, लेकिन इसका केंद्र श्वास नहीं, बल्कि दो श्वासों के बीच का मौन है। यह विधि साधक को उस सूक्ष्म क्षण का अनुभव कराती है जहाँ मन, विचार और समय का प्रभाव क्षीण होने लगता है।
यह ध्यान विधि विज्ञान भैरव तंत्र में वर्णित है और इसे अत्यंत गहन साधनाओं में से एक माना जाता है।
दूसरी ध्यान विधि का संस्कृत श्लोक
मरुतोऽन्तर्बहिर्वापि वियद्युग्मानिवर्तनात्।
भैरव्या भैरवस्येत्थं भैरवि व्यज्यते वपुः॥
सरल भावार्थ
भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि जब साधक भीतर जाती हुई श्वास और बाहर आती हुई श्वास के बीच के सूक्ष्म विराम का पूर्ण जागरूकता से अनुभव करता है, तब उसी मौन में भैरव अर्थात् परम चेतना का स्वरूप प्रकट होने लगता है।
इस ध्यान विधि का अभ्यास कैसे करें?
- शांत और स्वच्छ स्थान पर सुखासन, पद्मासन या किसी आरामदायक मुद्रा में बैठें।
- रीढ़ को सीधा रखें और शरीर को पूरी तरह शिथिल करें।
- अपनी श्वास को स्वाभाविक रहने दें।
- जब श्वास भीतर जाए, उसे बिना किसी प्रयास के देखें।
- जब श्वास पूरी भर जाए, उस सूक्ष्म विराम को महसूस करें।
- फिर श्वास को बाहर आते हुए देखें।
- बाहर की श्वास समाप्त होने पर जो अगला सूक्ष्म मौन उत्पन्न होता है, उसका भी साक्षी बनें।
- इस पूरी प्रक्रिया में केवल जागरूक रहें, किसी प्रकार का नियंत्रण या दबाव न डालें।
इस विधि का आध्यात्मिक रहस्य
भगवान शिव के अनुसार श्वासों के बीच का मौन केवल शारीरिक विराम नहीं है। यह वह अवस्था है जहाँ मन की गति क्षणभर के लिए रुक जाती है। यदि साधक उसी क्षण में स्थिर रह सके, तो वह अपने वास्तविक स्वरूप की झलक प्राप्त कर सकता है।
नियमित अभ्यास के लाभ
- मानसिक तनाव और चिंता में कमी आती है।
- मन अधिक शांत और स्थिर होता है।
- ध्यान की गहराई बढ़ती है।
- वर्तमान क्षण में रहने की क्षमता विकसित होती है।
- आत्मिक शांति और आंतरिक आनंद का अनुभव होता है।
अभ्यास करते समय
- श्वास को जबरदस्ती रोकने का प्रयास न करें।
- विराम को स्वाभाविक रूप से आने दें।
- यदि मन भटक जाए तो बिना निराश हुए पुनः श्वास पर लौट आएँ।
- प्रतिदिन 10–20 मिनट नियमित अभ्यास करें।
भगवान शिव की दूसरी ध्यान विधि हमें यह सिखाती है कि परम सत्य कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर हर श्वास के बीच उपस्थित मौन में छिपा है। जब साधक उस मौन का अनुभव करना सीख जाता है, तब ध्यान केवल एक अभ्यास नहीं रहता, बल्कि जीवन की सहज अवस्था बन जाता है।
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