प्रकृति और आत्मा क्या है?
भारतीय दर्शन में प्रकृति और आत्मा दो मूलभूत तत्त्व माने गए हैं। प्रकृति वह शक्ति है जिससे समस्त भौतिक जगत की उत्पत्ति होती है। शरीर, मन, इंद्रियाँ और यह दृश्य ब्रह्मांड प्रकृति के ही विविध रूप हैं। प्रकृति परिवर्तनशील है; इसमें निरंतर सृजन, स्थिति और परिवर्तन का क्रम चलता रहता है।
इसके विपरीत आत्मा शुद्ध चेतना का स्वरूप है। वह न जन्म लेती है, न नष्ट होती है। आत्मा साक्षी है—वह शरीर और मन के अनुभवों को देखती है, पर उनसे बंधती नहीं। भारतीय ऋषियों ने आत्मा को शाश्वत, निर्मल और आनंदस्वरूप बताया है।
आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य प्रकृति और आत्मा के भेद को जानना है। जब मनुष्य समझ लेता है कि वह केवल शरीर या मन नहीं, बल्कि शुद्ध आत्मा है, तब उसके जीवन में शांति, विवेक और आंतरिक स्वतंत्रता का उदय होता है। यही आत्मज्ञान का मार्ग है, जो मनुष्य को स्थायी सुख और मुक्ति की ओर ले जाता है।
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