उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

अर्थ:
👉 मनुष्य खुद ही अपना मित्र भी है और शत्रु भी।



2.जन्म–मृत्यु का रहस्य

श्लोक (2.20):
न जायते म्रियते वा कदाचित्
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अर्थ:
👉 आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है।

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