पतंजलि योगदर्शन (भाग 2) – चित्त वृत्तियाँ और उनका नियंत्रण
पिछले भाग में हमने योग की परिभाषा समझी। अब इस भाग में हम जानेंगे कि मन (चित्त) की वृत्तियाँ क्या होती हैं और उन्हें कैसे नियंत्रित किया जाए।
1. चित्त की वृत्तियाँ क्या हैं?
📜 सूत्र 1.5
वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाऽक्लिष्टाः
👉 अर्थ:
चित्त की वृत्तियाँ (मानसिक गतिविधियाँ) पाँच प्रकार की होती हैं — और ये दुखद (क्लिष्ट) या सुखद (अक्लिष्ट) हो सकती हैं।
👉 व्याख्या:
हमारे मन में हर समय कुछ न कुछ चलता रहता है — यही वृत्तियाँ हैं। कुछ हमें परेशान करती हैं (जैसे डर), और कुछ मदद करती हैं (जैसे ज्ञान)।
2. पाँच प्रकार की वृत्तियाँ
📜 सूत्र 1.6
प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृतयः
👉 अर्थ:
चित्त की पाँच वृत्तियाँ हैं:
प्रमाण (सही ज्ञान)
विपर्यय (गलत ज्ञान)
विकल्प (कल्पना)
निद्रा (नींद)
स्मृति (यादें)
(1) प्रमाण – सही ज्ञान
📜 सूत्र 1.7
प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि
👉 अर्थ:
प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्र — ये सही ज्ञान के स्रोत हैं।
👉 व्याख्या:
आँखों से देखना (प्रत्यक्ष)
तर्क से समझना (अनुमान)
गुरु या शास्त्र से सीखना (आगम)
(2) विपर्यय – गलत ज्ञान
📜 सूत्र 1.8
विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्
👉 अर्थ:
जो वास्तविकता के विपरीत ज्ञान है, वह विपर्यय है।
👉 व्याख्या:
जैसे अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना — यह गलत ज्ञान है।
(3) विकल्प – कल्पना
📜 सूत्र 1.9
शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः
👉 अर्थ:
शब्दों पर आधारित, लेकिन वास्तविकता में मौजूद नहीं — वह विकल्प है।
👉 व्याख्या:
जैसे "भूत", "स्वर्ग" की कल्पना — जो हमने सुना है, पर देखा नहीं।
(4) निद्रा – नींद
📜 सूत्र 1.10
अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा
👉 अर्थ:
जिसमें कुछ भी अनुभव नहीं होता — वह निद्रा है।
👉 व्याख्या:
नींद में भी मन सक्रिय रहता है, लेकिन वह "कुछ नहीं" का अनुभव करता है।
(5) स्मृति – यादें
📜 सूत्र 1.11
अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः
👉 अर्थ:
जो अनुभव किया गया है, उसे याद रखना — स्मृति है।
👉 व्याख्या:
हमारे पुराने अनुभव, यादें — ये भी मन की वृत्तियाँ हैं।
3. वृत्तियों को कैसे रोकें?
📜 सूत्र 1.12
अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः
👉 अर्थ:
वृत्तियों को रोकने के लिए अभ्यास और वैराग्य जरूरी है।
👉 व्याख्या:
रोज ध्यान करना (अभ्यास)
इच्छाओं को छोड़ना (वैराग्य)
4. अभ्यास की गहराई
📜 सूत्र 1.14
स तु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारासेवितो दृढभूमिः
👉 अर्थ:
जब अभ्यास लंबे समय तक, बिना रुके और श्रद्धा से किया जाए — तब वह मजबूत बनता है।
👉 व्याख्या:
👉 2 दिन ध्यान करके छोड़ देना काम नहीं करेगा
👉 लगातार अभ्यास ही सफलता देगा
5. वैराग्य का उच्च स्तर
📜 सूत्र 1.16
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्
👉 अर्थ:
जब आत्मा का ज्ञान हो जाता है, तब प्रकृति के गुणों से भी वैराग्य हो जाता है।
👉 व्याख्या:
यह वैराग्य का सबसे ऊँचा स्तर है — जहाँ कोई इच्छा नहीं बचती।
इस भाग से हमें यह समझ आता है:
मन की 5 मुख्य वृत्तियाँ होती हैं
हर विचार इन वृत्तियों में आता है
अभ्यास और वैराग्य से मन को शांत किया जा सकता है
👉 जब आप इन वृत्तियों को पहचान लेते हैं, तभी आप साक्षी भाव में जा सकते हैं।
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