साक्षी कैसे बनें? – साक्षी भाव की साधना का सरल मार्ग
योग, ध्यान और आध्यात्मिक साधना में "साक्षी भाव" का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। महर्षि पतंजलि के योगसूत्र, भगवान कृष्ण की भगवद्गीता, अष्टावक्र गीता और विज्ञान भैरव तंत्र सभी साक्षी भाव की ओर संकेत करते हैं।
साक्षी बनने का अर्थ है – स्वयं को विचारों, भावनाओं और शरीर से अलग जानना तथा उन्हें केवल देखना। जब मनुष्य देखने वाला बन जाता है, तब वह अपने वास्तविक स्वरूप अर्थात आत्मा का अनुभव करने लगता है।
साक्षी भाव क्या है?
साक्षी का अर्थ है – देखने वाला।
जब आप अपने विचारों, भावनाओं, इच्छाओं और शरीर की गतिविधियों को बिना किसी प्रतिक्रिया के देखते हैं, तब आप साक्षी भाव में होते हैं।
उदाहरण के लिए:
मन में क्रोध आया।
सामान्य व्यक्ति कहता है – "मैं क्रोधित हूँ।"
साक्षी व्यक्ति देखता है – "क्रोध मन में उत्पन्न हो रहा है।"
यही अंतर साक्षी भाव और सामान्य चेतना में है।
हम साक्षी क्यों नहीं रह पाते?
मनुष्य सामान्यतः शरीर और मन के साथ अपनी पहचान बना लेता है।
वह सोचता है:
मैं शरीर हूँ।
मैं मन हूँ।
मैं विचार हूँ।
लेकिन योग दर्शन कहता है कि आत्मा इन सबकी साक्षी है।
जब हम विचारों में बह जाते हैं, तब साक्षी भाव खो जाता है।
साक्षी बनने की सरल विधि
1. श्वास का निरीक्षण करें
शांत बैठें और अपनी श्वास को देखें।
श्वास अंदर जा रही है।
श्वास बाहर आ रही है।
केवल देखें, उसे नियंत्रित करने का प्रयास न करें।
धीरे-धीरे देखने वाला जागने लगेगा।
2. विचारों को देखें
ध्यान करते समय विचार आएंगे।
उनसे लड़ें नहीं।
केवल देखें:
यह विचार आया।
कुछ देर रुका।
फिर चला गया।
आकाश में गुजरते बादलों की तरह विचारों को गुजरने दें।
3. भावनाओं के साक्षी बनें
जब क्रोध, भय, चिंता या खुशी आए तो तुरंत प्रतिक्रिया न दें।
अपने भीतर देखें:
"मेरे भीतर यह भावना उठ रही है।"
भावना को देखने मात्र से उसका प्रभाव कम होने लगता है।
4. दैनिक कार्यों में जागरूक रहें
चलते समय देखें कि शरीर चल रहा है।
खाते समय देखें कि भोजन ग्रहण किया जा रहा है।
बोलते समय देखें कि शब्द निकल रहे हैं।
धीरे-धीरे जीवन का प्रत्येक कार्य ध्यान बन सकता है।
पतंजलि योगसूत्र और साक्षी भाव
महर्षि पतंजलि कहते हैं:
"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"
अर्थात चित्त की वृत्तियों का शांत होना ही योग है।
जब साधक विचारों को देखना सीखता है और उनसे जुड़ना छोड़ देता है, तब चित्त धीरे-धीरे शांत होने लगता है।
साक्षी भाव योग की उच्च अवस्थाओं की आधारशिला है।
भगवद्गीता में साक्षी भाव
भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय में समान रहता है।
यह समता तभी संभव है जब व्यक्ति साक्षी भाव में स्थित हो।
जो घटनाओं को देखता है लेकिन उनमें डूबता नहीं, वही स्थिर बुद्धि कहलाता है।
विज्ञान भैरव तंत्र में साक्षी
विज्ञान भैरव तंत्र के अनेक ध्यान सूत्र देखने की कला सिखाते हैं।
वहाँ कहा गया है कि श्वास, ध्वनि, विचार या किसी भी अनुभव को पूर्ण जागरूकता से देखो।
देखते-देखते देखने वाला ही शेष रह जाता है और वही आत्मबोध का द्वार बनता है।
साक्षी भाव के लाभ
मानसिक लाभ
तनाव कम होता है।
चिंता घटती है।
मन शांत होता है।
आध्यात्मिक लाभ
आत्मचेतना जागृत होती है।
ध्यान गहरा होता है।
भीतर आनंद का अनुभव होने लगता है।
व्यावहारिक लाभ
निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
प्रतिक्रियाएँ कम होती हैं।
संबंध बेहतर होते हैं।
साक्षी बनना कोई कठिन साधना नहीं है। यह केवल देखने की कला है। जब आप अपने विचारों, भावनाओं और शरीर को देखने लगते हैं, तब धीरे-धीरे आपके भीतर का साक्षी जागृत होने लगता है।
यही साक्षी भाव ध्यान का हृदय है, योग का सार है और आत्मज्ञान का द्वार है।
आज से कुछ मिनट प्रतिदिन अपने श्वास और विचारों को देखना शुरू करें। धीरे-धीरे आप अनुभव करेंगे कि आप विचार नहीं हैं, शरीर नहीं हैं, बल्कि इन सबके साक्षी हैं।
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