विज्ञान भैरव तंत्र – ध्यान विधि 1

विज्ञान भैरव तंत्र – ध्यान विधि 1

श्वास के बाहर जाने और भीतर आने के बीच के क्षण को जानो। उस मध्य बिंदु में भैरव का अनुभव होता है।

सरल अर्थ

भगवान शिव कहते हैं कि जब श्वास बाहर निकलती है और फिर भीतर प्रवेश करती है, इन दोनों के बीच एक सूक्ष्म विराम होता है। उसी विराम में मन कुछ क्षण के लिए शांत हो जाता है। यदि साधक उस क्षण के प्रति जागरूक हो जाए, तो वह अपनी वास्तविक चेतना की झलक पा सकता है।

विस्तृत व्याख्या

हम दिन-रात श्वास लेते हैं, लेकिन अधिकांश समय उसके प्रति सजग नहीं होते। विज्ञान भैरव तंत्र श्वास को केवल शारीरिक प्रक्रिया नहीं मानता, बल्कि ध्यान का द्वार मानता है।

श्वास के दो महत्वपूर्ण बिंदु हैं—

- जब श्वास पूरी तरह बाहर निकल जाती है।
- जब श्वास पूरी तरह भीतर भर जाती है।

इन दोनों स्थितियों के बीच एक छोटा सा मौन और स्थिरता का क्षण आता है। यही ध्यान का केंद्र है।

ध्यान विधि

चरण 1

शांत स्थान पर आराम से बैठ जाएँ।

चरण 2

आँखें बंद करें और शरीर को ढीला छोड़ दें।

चरण 3

श्वास को नियंत्रित न करें। उसे स्वाभाविक रूप से चलने दें।

चरण 4

ध्यान दें जब श्वास बाहर निकलती है।

चरण 5

उस क्षण को महसूस करें जब अगली श्वास शुरू होने से पहले हल्का विराम आता है।

चरण 6

उसी विराम में जागरूक बने रहें।

चरण 7

15–20 मिनट तक अभ्यास करें।


- श्वास को जबरदस्ती न रोके
- किसी विशेष अनुभव की अपेक्षा न रखें।
- अभ्यास सहज और प्राकृतिक रखें।
- यदि चक्कर आए तो सामान्य श्वास लें।

लाभ

- मन की शांति
- तनाव में कमी
- एकाग्रता में वृद्धि
- वर्तमान क्षण की जागरूकता
- ध्यान की गहराई में प्रवेश

विज्ञान भैरव तंत्र की यह पहली विधि हमें सिखाती है कि आत्मज्ञान कहीं दूर नहीं है। वह हमारी प्रत्येक श्वास के बीच मौजूद है। आवश्यकता केवल जागरूक होने की है।

"श्वासों के मध्य का मौन ही चेतना का द्वार है।"

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