विज्ञान भैरव तंत्र – ध्यान विधि 1
मूल श्लोक
श्रीभैरव उवाच—
ऊर्ध्वे प्राणो ह्यधो जीवो विसर्गात्मा परोच्चरेत्।
उत्पत्तिद्वितयस्थाने भरणाद् भरिता स्थितिः॥ २४॥
शब्दार्थ
- ऊर्ध्वे = ऊपर की ओर
- प्राणः = प्राण वायु
- अधः = नीचे की ओर
- जीवः = जीवनी शक्ति
- विसर्ग = श्वास का बाहर निकलना
- उत्पत्ति = उदय होना
- स्थाने = स्थान
- स्थितिः = स्थिर अवस्था
भावार्थ
भगवान शिव कहते हैं कि प्राण ऊपर की ओर और अपान नीचे की ओर गति करता है। श्वास के आने और जाने के बीच जो सूक्ष्म बिंदु है, उसमें ध्यान स्थिर करने से साधक चेतना की गहन अवस्था का अनुभव कर सकता है।
विस्तृत व्याख्या
हमारी श्वास निरंतर चलती रहती है। सामान्य व्यक्ति केवल श्वास की गति को जानता है, लेकिन साधक श्वास के मध्य के मौन को पहचानता है।
जब श्वास भीतर जाती है और जब बाहर आती है, इन दोनों के बीच सूक्ष्म विराम उत्पन्न होता है। यही विराम ध्यान का द्वार है।
भगवान शिव संकेत करते हैं कि यदि साधक इस विराम पर जागरूक हो जाए, तो उसका मन शांत होने लगता है और चेतना का अनुभव गहरा होने लगता है।
ध्यान विधि
चरण 1
शांत स्थान पर आराम से बैठ जाएँ।
चरण 2
आँखें बंद करें और श्वास को स्वाभाविक रहने दें।
चरण 3
श्वास के भीतर जाने को महसूस करें।
चरण 4
जब श्वास पूरी भर जाए, उस सूक्ष्म विराम को देखें।
चरण 5
फिर श्वास के बाहर निकलने को देखें।
चरण 6
बाहर निकलने के बाद के विराम को भी महसूस करें।
चरण 7
15 मिनट तक अभ्यास करें।
लाभ
- मन की शांति
- एकाग्रता में वृद्धि
- तनाव में कमी
- वर्तमान क्षण की जागरूकता
- ध्यान की गहराई
भगवान शिव की यह विधि बताती है कि आत्मज्ञान का द्वार हमारी अपनी श्वास में छिपा हुआ है। श्वासों के मध्य का मौन ही ध्यान का वास्तविक प्रवेश द्वार है।
"जहाँ श्वास रुकती है, वहाँ मन शांत होता है; जहाँ मन शांत होता है, वहाँ चेतना प्रकट होती है।"
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