पतंजलि योगसूत्र के अनुसार अभिनिवेश क्या है?
महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में पाँच क्लेशों का वर्णन किया है—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। इनमें अभिनिवेश पाँचवाँ और अंतिम क्लेश है।
अभिनिवेश का संबंध जीवन के प्रति अत्यधिक आसक्ति और मृत्यु के भय से है। यह क्लेश इतना सूक्ष्म है कि ज्ञानी व्यक्ति भी इसके प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाता। पतंजलि के अनुसार यह क्लेश जन्म-जन्मांतर के संस्कारों से उत्पन्न होता है।
अभिनिवेश की परिभाषा
पतंजलि योगसूत्र (2.9) में कहा गया है:
"स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः"
अर्थात्—
अपने स्वभाव से प्रवाहित होने वाला और विद्वान व्यक्ति में भी विद्यमान रहने वाला जीवन के प्रति चिपकाव अभिनिवेश है।
सरल शब्दों में, जीवित रहने की तीव्र इच्छा और मृत्यु का भय अभिनिवेश कहलाता है।
अभिनिवेश कैसे उत्पन्न होता है?
अभिनिवेश का मूल कारण अविद्या है।
जब व्यक्ति स्वयं को शरीर मान लेता है, तब उसे लगता है कि शरीर के नष्ट होने पर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इसी भ्रम के कारण मृत्यु का भय उत्पन्न होता है।
यदि व्यक्ति आत्मा और शरीर के अंतर को जान ले, तो अभिनिवेश धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है।
अभिनिवेश के लक्षण
1. मृत्यु का भय
यह अभिनिवेश का सबसे स्पष्ट रूप है।
मनुष्य मृत्यु की चर्चा से भी असहज हो सकता है क्योंकि वह अपने अस्तित्व के समाप्त होने की कल्पना करता है।
2. जीवन से अत्यधिक चिपकाव
हर परिस्थिति में केवल जीवित रहने की चिंता करना।
3. परिवर्तन का भय
नौकरी, संबंध, स्थान या जीवनशैली में बदलाव से डरना भी अभिनिवेश का सूक्ष्म रूप हो सकता है।
4. भविष्य की चिंता
लगातार भविष्य के बारे में डर और असुरक्षा की भावना रखना।
5. सुरक्षा के प्रति अत्यधिक आग्रह
हर समय स्वयं को सुरक्षित रखने की चिंता में जीना।
अभिनिवेश क्यों दुःख का कारण है?
अभिनिवेश व्यक्ति को वर्तमान में जीने नहीं देता।
इसके कारण:
- भय उत्पन्न होता है।
- चिंता बढ़ती है।
- मानसिक तनाव रहता है।
- जीवन में सहजता कम हो जाती है।
- आत्मज्ञान का मार्ग कठिन हो जाता है।
जब मन मृत्यु के भय में बंधा रहता है, तब वह स्वतंत्र नहीं रह सकता।
योगदर्शन में आत्मा की अवधारणा
पतंजलि योगदर्शन के अनुसार आत्मा शाश्वत है।
आत्मा:
- जन्म नहीं लेती।
- मृत्यु को प्राप्त नहीं होती।
- नष्ट नहीं होती।
- सदैव साक्षी रहती है।
मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है, आत्मा का नहीं।
इस सत्य का अनुभव होने पर अभिनिवेश कमजोर होने लगता है।
अभिनिवेश को कैसे दूर करें?
1. आत्मचिंतन
अपने वास्तविक स्वरूप पर विचार करना।
बार-बार स्वयं से पूछना:
"क्या मैं केवल शरीर हूँ, या शरीर का साक्षी भी हूँ?"
2. ध्यान
ध्यान मन को शांत करता है और आत्मा की अनुभूति की दिशा में ले जाता है।
3. साक्षीभाव
विचारों, भावनाओं और भय को देखने का अभ्यास करें।
जब व्यक्ति भय का साक्षी बनता है, तब भय की पकड़ कमजोर होने लगती है।
4. विवेक
नित्य और अनित्य के बीच भेद करना।
शरीर अनित्य है, जबकि आत्मा नित्य है।
5. ईश्वर-प्रणिधान
समर्पण की भावना मृत्यु और भविष्य के भय को कम करने में सहायता करती है।
अभिनिवेश से मुक्ति का फल
जब अभिनिवेश कम होने लगता है:
- मृत्यु का भय घटता है।
- मन अधिक शांत होता है।
- जीवन में सहजता आती है।
- वर्तमान में जीना आसान हो जाता है।
- आत्मज्ञान का मार्ग स्पष्ट होता है।
ऐसा साधक जीवन और मृत्यु दोनों को समभाव से देखने लगता है।
पाँच क्लेशों का सार
पतंजलि के अनुसार:
- अविद्या → मूल कारण
- अस्मिता → अहंकार
- राग → आसक्ति
- द्वेष → घृणा
- अभिनिवेश → मृत्यु का भय
इन पाँचों क्लेशों का क्षय ही योग साधना का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।
पतंजलि योगसूत्र के अनुसार अभिनिवेश जीवन के प्रति अत्यधिक आसक्ति और मृत्यु के भय का नाम है। यह अविद्या से उत्पन्न होता है और व्यक्ति को चिंता, भय तथा मानसिक अशांति में रखता है। ध्यान, साक्षीभाव, आत्मचिंतन, विवेक और ईश्वर-प्रणिधान के माध्यम से अभिनिवेश को कम किया जा सकता है। जब यह क्लेश समाप्त होने लगता है, तब साधक जीवन और मृत्यु के पार स्थित आत्मा के सत्य का अनुभव करने लगता है।
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