विज्ञान भैरव तंत्र में श्वास का महत्व
यदि विज्ञान भैरव तंत्र की 112 ध्यान विधियों का अध्ययन किया जाए, तो एक बात स्पष्ट दिखाई देती है—भगवान शिव ने श्वास को आत्म-जागरण का अत्यंत महत्वपूर्ण साधन माना है।
श्वास जीवन का आधार है। जन्म के समय हमारी पहली क्रिया श्वास लेना होती है और मृत्यु के समय अंतिम क्रिया श्वास छोड़ना। इसके बावजूद अधिकांश लोग अपनी श्वास के प्रति जागरूक नहीं होते।
विज्ञान भैरव तंत्र हमें सिखाता है कि साधारण दिखाई देने वाली श्वास ही परम चेतना के द्वार तक ले जा सकती है।
श्वास और मन का संबंध
प्राचीन योग परंपरा के अनुसार श्वास और मन का गहरा संबंध है।
जब मन अशांत होता है—
- श्वास तेज हो जाती है।
- सांसें छोटी और अस्थिर हो जाती हैं।
जब मन शांत होता है—
- श्वास गहरी हो जाती है।
- सांसों में सहजता और लय आ जाती है।
इसी कारण श्वास पर ध्यान देना मन को समझने और शांत करने का प्रभावी माध्यम माना गया है।
विज्ञान भैरव तंत्र की दृष्टि
भगवान शिव श्वास को केवल शरीर की जैविक प्रक्रिया नहीं मानते, बल्कि चेतना तक पहुंचने का मार्ग बताते हैं।
वे साधक को श्वास के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान देने की सलाह देते हैं—
- श्वास के भीतर प्रवेश करने का अनुभव।
- श्वास के बाहर निकलने का अनुभव।
- दोनों श्वासों के बीच का सूक्ष्म विराम।
- श्वास की निरंतर जागरूकता।
इन क्षणों में मन स्वाभाविक रूप से शांत होने लगता है।
श्वासों के बीच का मौन
विज्ञान भैरव तंत्र की कई ध्यान विधियाँ श्वासों के बीच के छोटे से अंतराल पर आधारित हैं।
जब एक श्वास समाप्त होती है और दूसरी शुरू होने वाली होती है, तब एक अत्यंत सूक्ष्म विराम उत्पन्न होता है।
यह विराम—
- विचारों से मुक्त होता है।
- पूर्ण मौन से भरा होता है।
- चेतना के अनुभव का द्वार बन सकता है।
साधक यदि इस क्षण को पहचान ले, तो उसे गहन शांति का अनुभव हो सकता है।
अभ्यास की सरल विधि
एक शांत स्थान पर बैठें।
- शरीर को सहज रखें।
- श्वास को नियंत्रित न करें।
- केवल उसके आने और जाने को देखें।
- श्वासों के बीच के छोटे अंतराल को महसूस करें।
- किसी विचार से संघर्ष न करें।
कुछ मिनटों का यह अभ्यास मन को स्थिर करने में सहायक हो सकता है।
आधुनिक जीवन में उपयोग
आज अधिकांश लोग तनाव, चिंता और व्यस्तता से जूझ रहे हैं।
ऐसे समय में श्वास की जागरूकता—
- तनाव कम कर सकती है।
- वर्तमान क्षण में ला सकती है।
- मानसिक स्पष्टता बढ़ा सकती है।
- भावनात्मक संतुलन विकसित कर सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि श्वास हमेशा हमारे साथ रहती है, इसलिए ध्यान का यह साधन हर समय उपलब्ध है।
विज्ञान भैरव तंत्र के अनुसार श्वास केवल जीवित रहने का साधन नहीं, बल्कि आत्म-जागरण का मार्ग भी है।
जो व्यक्ति अपनी श्वास के प्रति जागरूक हो जाता है, वह धीरे-धीरे अपने मन, भावनाओं और चेतना को भी समझने लगता है।
भगवान शिव हमें याद दिलाते हैं कि जिस सत्य की हम खोज कर रहे हैं, उसका द्वार हमारी अपनी श्वास में ही छिपा हुआ है।
"श्वास को जानो, स्वयं को जानो; स्वयं को जानो, सत्य को जानो।"
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