पतंजलि योगसूत्र के अनुसार चित्तवृत्तियाँ क्या हैं और उनका निरोध कैसे करें?
महर्षि पतंजलि ने योग को मन की चंचलता को शांत करने की प्रक्रिया बताया है। योगसूत्र का प्रसिद्ध सूत्र है:
"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" (योगसूत्र 1.2)
अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
यह सूत्र पूरे योग दर्शन का आधार है। जब तक मन विभिन्न विचारों, कल्पनाओं और स्मृतियों में उलझा रहता है, तब तक साधक अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव नहीं कर सकता। इसलिए पतंजलि ने चित्तवृत्तियों को समझना और उनका निरोध करना आवश्यक बताया है।
चित्त क्या है?
योग दर्शन में चित्त मन, बुद्धि और अहंकार का संयुक्त रूप है। चित्त बाहरी संसार से जानकारी ग्रहण करता है, उसका विश्लेषण करता है और उसके आधार पर प्रतिक्रिया देता है।
चित्त एक झील की तरह है। जब झील में लहरें उठती हैं तो उसका तल दिखाई नहीं देता। उसी प्रकार जब चित्त में विचारों की तरंगें उठती हैं तो आत्मा का वास्तविक स्वरूप दिखाई नहीं देता।
चित्त की पाँच वृत्तियाँ
पतंजलि ने चित्त की पाँच मुख्य वृत्तियाँ बताई हैं:
1. प्रमाण
सही ज्ञान को प्रमाण कहा जाता है।
प्रमाण तीन प्रकार के होते हैं:
- प्रत्यक्ष (सीधा अनुभव)
- अनुमान (तर्क द्वारा ज्ञान)
- आगम (विश्वसनीय स्रोतों से प्राप्त ज्ञान)
उदाहरण: आग को देखकर उसका गर्म होना जानना प्रमाण है।
2. विपर्यय
गलत ज्ञान या भ्रम को विपर्यय कहा जाता है।
उदाहरण: अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना।
जब सत्य का ज्ञान हो जाता है तो यह भ्रम समाप्त हो जाता है।
3. विकल्प
ऐसा ज्ञान जिसका वास्तविक वस्तु से संबंध न हो, विकल्प कहलाता है।
उदाहरण: कल्पनाएँ, काल्पनिक कहानियाँ या मन में बनाई गई धारणाएँ।
4. निद्रा
नींद भी एक चित्तवृत्ति है।
जब व्यक्ति सोता है तब भी चित्त पूरी तरह निष्क्रिय नहीं होता। जागने पर व्यक्ति कहता है कि "मैं अच्छी नींद सोया" या "मुझे नींद नहीं आई", यह निद्रा वृत्ति का अनुभव है।
5. स्मृति
पूर्व अनुभवों का संग्रह स्मृति कहलाता है।
अच्छी और बुरी दोनों प्रकार की स्मृतियाँ मन को प्रभावित करती हैं।
चित्तवृत्तियाँ क्यों बाधक हैं?
जब मन निरंतर विचारों, स्मृतियों और कल्पनाओं में उलझा रहता है, तब साधक वर्तमान क्षण में नहीं रह पाता।
इसके परिणाम:
- तनाव बढ़ता है
- एकाग्रता कम होती है
- चिंता और भय उत्पन्न होते हैं
- आत्मज्ञान कठिन हो जाता है
इसीलिए पतंजलि ने चित्तवृत्तियों के निरोध को योग का लक्ष्य बताया है।
चित्तवृत्तियों का निरोध कैसे करें?
1. अभ्यास
पतंजलि कहते हैं:
"अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः" (योगसूत्र 1.12)
अर्थात् अभ्यास और वैराग्य से चित्तवृत्तियों का निरोध होता है।
अभ्यास का अर्थ है बार-बार मन को एक विषय पर स्थिर करने का प्रयास।
2. वैराग्य
वैराग्य का अर्थ संसार से भागना नहीं है।
वैराग्य का अर्थ है विषयों के प्रति आसक्ति का कम होना।
जब मन इच्छाओं और आकर्षणों से मुक्त होने लगता है तब वह अधिक शांत हो जाता है।
3. प्राणायाम
श्वास और मन का गहरा संबंध है।
धीमी और गहरी श्वास मन को शांत करती है तथा विचारों की गति कम करती है।
4. ध्यान
ध्यान चित्त को स्थिर करने की सर्वोत्तम विधि है।
नियमित ध्यान से:
- विचारों की संख्या कम होती है
- मन शांत होता है
- एकाग्रता बढ़ती है
- आत्मनिरीक्षण विकसित होता है
5. ईश्वर-प्रणिधान
ईश्वर के प्रति समर्पण भी चित्त की शुद्धि का एक प्रभावी साधन है।
समर्पण से अहंकार कम होता है और मन में शांति आती है।
चित्तवृत्ति निरोध का परिणाम
जब चित्त की वृत्तियाँ शांत हो जाती हैं, तब साधक अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव करता है।
पतंजलि कहते हैं:
"तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्" (योगसूत्र 1.3)
अर्थात् तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।
यही आत्मज्ञान और योग की वास्तविक अवस्था है।
पतंजलि योगसूत्र के अनुसार मनुष्य के दुःख का मुख्य कारण चित्त की अस्थिरता है। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति जैसी चित्तवृत्तियाँ मन को बाहरी संसार में उलझाए रखती हैं। अभ्यास, वैराग्य, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से इन वृत्तियों का निरोध किया जा सकता है। जब मन पूर्णतः शांत हो जाता है, तब साधक अपने वास्तविक आत्मस्वरूप का अनुभव करता है और यही योग का परम लक्ष्य है।
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