पतंजलि योगसूत्र के अनुसार अविद्या क्या है?
पतंजलि योगदर्शन में मनुष्य के दुःखों का मूल कारण अविद्या को बताया गया है। जब तक अविद्या बनी रहती है, तब तक मनुष्य जन्म-मरण, सुख-दुःख, राग-द्वेष और अहंकार के बंधन में फँसा रहता है।
योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ने अविद्या को सभी क्लेशों की जड़ बताया है। यदि अविद्या का नाश हो जाए, तो मनुष्य आत्मज्ञान प्राप्त कर सकता है और कैवल्य की ओर बढ़ सकता है।
क्लेश क्या हैं?
पतंजलि ने पाँच क्लेश बताए हैं:
- अविद्या
- अस्मिता
- राग
- द्वेष
- अभिनिवेश
इनमें अविद्या सबसे प्रमुख है, क्योंकि अन्य सभी क्लेश उसी से उत्पन्न होते हैं।
अविद्या की परिभाषा
पतंजलि योगसूत्र (2.5) में कहा गया है:
"अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या"
अर्थात्—
अनित्य को नित्य समझना, अशुद्ध को शुद्ध समझना, दुःख को सुख समझना और अनात्मा को आत्मा समझना ही अविद्या है।
यह सूत्र अविद्या की सबसे स्पष्ट परिभाषा देता है।
अविद्या के चार रूप
1. अनित्य को नित्य समझना
इस संसार की सभी वस्तुएँ परिवर्तनशील हैं।
- शरीर बदलता है।
- धन आता-जाता है।
- संबंध बदलते हैं।
- परिस्थितियाँ बदलती हैं।
फिर भी मनुष्य इन्हें स्थायी मान लेता है। यही अविद्या है।
2. अशुद्ध को शुद्ध समझना
शरीर प्रकृति का बना हुआ है और निरंतर परिवर्तनशील है।
फिर भी मनुष्य शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है। यह अशुद्ध को शुद्ध मानने की भूल है।
3. दुःख को सुख समझना
भौतिक सुख क्षणिक होते हैं।
विषयों से मिलने वाला सुख कुछ समय बाद दुःख का कारण बन सकता है। फिर भी मनुष्य उनमें स्थायी सुख खोजता रहता है।
यही अविद्या का प्रभाव है।
4. अनात्मा को आत्मा समझना
यह अविद्या का सबसे गहरा रूप है।
मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार को ही अपना स्वरूप मान लेता है, जबकि योगदर्शन के अनुसार आत्मा इन सबसे भिन्न है।
अविद्या से उत्पन्न होने वाले क्लेश
अस्मिता
जब व्यक्ति शरीर और मन को ही "मैं" मान लेता है, तो अहंकार उत्पन्न होता है।
राग
सुखद वस्तुओं के प्रति आकर्षण राग कहलाता है।
द्वेष
दुःखद अनुभवों के प्रति घृणा या विरोध द्वेष कहलाता है।
अभिनिवेश
मृत्यु का भय और जीवन के प्रति अत्यधिक आसक्ति अभिनिवेश है।
ये सभी अविद्या के परिणाम हैं।
अविद्या का नाश कैसे करें?
1. स्वाध्याय
योगग्रंथों और आध्यात्मिक साहित्य का अध्ययन मनुष्य को सत्य का ज्ञान देता है।
2. ध्यान
ध्यान के माध्यम से व्यक्ति अपने विचारों और मन का निरीक्षण करता है।
धीरे-धीरे वह समझने लगता है कि वह मन नहीं, बल्कि उसका साक्षी है।
3. विवेक
नित्य और अनित्य में भेद करने की क्षमता विवेक कहलाती है।
विवेक का विकास अविद्या को कम करता है।
4. योगाभ्यास
अष्टांग योग के नियमित अभ्यास से मन शुद्ध होता है और आत्मज्ञान की दिशा में प्रगति होती है।
5. साक्षी भाव
जब व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को केवल देखता है, उनसे तादात्म्य नहीं करता, तब अविद्या धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है।
अविद्या से विद्या की ओर
विद्या का अर्थ केवल पुस्तक ज्ञान नहीं है।
योगदर्शन में विद्या का अर्थ है—
- आत्मा का ज्ञान
- सत्य का ज्ञान
- विवेक का जागरण
- वास्तविक स्वरूप की पहचान
जब विद्या का प्रकाश होता है, तब अविद्या का अंधकार स्वयं समाप्त हो जाता है।
पतंजलि योगसूत्र के अनुसार अविद्या सभी दुःखों और क्लेशों की जड़ है। अनित्य को नित्य, अशुद्ध को शुद्ध, दुःख को सुख और अनात्मा को आत्मा समझना ही अविद्या है। योग, ध्यान, स्वाध्याय, विवेक और साक्षीभाव के अभ्यास से अविद्या का नाश किया जा सकता है। जब अविद्या समाप्त होती है, तब आत्मज्ञान प्रकट होता है और साधक कैवल्य अर्थात् पूर्ण मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।
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