🕉 पतंजलि योगदर्शन
📖 प्रथम पाद – समाधि पाद (51 सूत्र)
1. अथ योगानुशासनम्।
अर्थ: अब योग का अनुशासन (शिक्षा) आरम्भ किया जाता है।
2. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
अर्थ: चित्त की वृत्तियों को रोकना ही योग है।
3. तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।
अर्थ: तब साधक अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है।
4. वृत्तिसारूप्यमितरत्र।
अर्थ: अन्यथा मन की वृत्तियों में लीन रहता है।
5. वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाऽक्लिष्टाः।
अर्थ: वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं, क्लेशयुक्त व अक्लेशयुक्त।
6. प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।
अर्थ: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति।
7. प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि।
अर्थ: प्रत्यक्ष, अनुमान और शास्त्रवचन प्रमाण हैं।
8. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्।
अर्थ: गलत ज्ञान को विपर्यय कहते हैं।
9. शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः।
अर्थ: शब्द पर आधारित कल्पना विकल्प है।
10. अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा।
अर्थ: अभाव पर आधारित वृत्ति निद्रा है।
11. अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः।
अर्थ: अनुभव का न खोना स्मृति है।
12. अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।
अर्थ: अभ्यास और वैराग्य से वृत्तियों का निरोध होता है।
13. तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः।
अर्थ: निरन्तर प्रयत्न अभ्यास है।
14. स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः।
अर्थ: दीर्घकाल तक श्रद्धा से किया गया अभ्यास दृढ़ होता है।
15. दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्।
अर्थ: भोगों से विरक्ति ही वैराग्य है।
16. तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्।
अर्थ: आत्मज्ञान के बाद गुणों से भी वैराग्य।
17. वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् संप्रज्ञातः।
अर्थ: वितर्क, विचार, आनन्द, अस्मिता से युक्त समाधि संप्रज्ञात है।
18. विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः।
अर्थ: निरोध के अभ्यास से असंप्रज्ञात समाधि होती है।
19. भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्।
अर्थ: कुछ योगी जन्म से ही समाधि अवस्था में होते हैं।
20. श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्।
अर्थ: अन्य साधकों के लिए श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा आवश्यक है।
21. तीव्रसंवेगानामासन्नः।
अर्थ: तीव्र साधना वालों को शीघ्र फल मिलता है।
22. मृदुमध्याधिमात्रत्वात्ततोऽपि विशेषः।
अर्थ: साधना की तीव्रता से भिन्नता होती है।
23. ईश्वरप्रणिधानाद्वा।
अर्थ: ईश्वर समर्पण से भी समाधि मिलती है।
24. क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः।
अर्थ: ईश्वर एक विशेष पुरुष है जो क्लेश से मुक्त है।
25. तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्।
अर्थ: ईश्वर सर्वज्ञता का मूल है।
26. स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्।
अर्थ: ईश्वर प्राचीन गुरुओं के भी गुरु हैं।
27. तस्य वाचकः प्रणवः।
अर्थ: उसका वाचक प्रणव (ॐ) है।
28. तज्जपस्तदर्थभावनम्।
अर्थ: ॐ का जप और उसके अर्थ का चिंतन।
29. ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च।
अर्थ: इससे आत्मज्ञान और बाधाओं का नाश होता है।
30. व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः।
अर्थ: रोग, आलस्य, संशय आदि बाधाएँ हैं।
31. दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः।
अर्थ: दुःख, बेचैनी, कम्पन, श्वास-प्रश्वास विक्षेप के लक्षण हैं।
32. तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः।
अर्थ: इनके नाश के लिए एक तत्व का अभ्यास।
33. मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्।
अर्थ: मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा से चित्त शुद्ध होता है।
34. प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य।
अर्थ: प्राणायाम से भी चित्त स्थिर होता है।
35. विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी।
अर्थ: विषय का सूक्ष्म ध्यान चित्त को स्थिर करता है।
36. विशोका वा ज्योतिष्मती।
अर्थ: तेजस्वी प्रकाश ध्यान का विषय हो सकता है।
37. वीतरागविषयं वा चित्तम्।
अर्थ: वीतराग महापुरुष पर ध्यान।
38. स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा।
अर्थ: स्वप्नज्ञान पर ध्यान।
39. यथाभिमतध्यानाद्वा।
अर्थ: इच्छित विषय पर ध्यान।
40. परमाणु परममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः।
अर्थ: साधक का ध्यान अणु से ब्रह्माण्ड तक जा सकता है।
41. क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः।
अर्थ: निर्मल मन में विषय स्पष्ट दिखता है।
42. तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः।
अर्थ: शब्दार्थ सहित समाधि सवितर्क है।
43. स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का।
अर्थ: केवल अर्थ का प्रकाश निर्वितर्का है।
44. एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता।
अर्थ: सूक्ष्म विषयों की समाधि।
45. सूक्ष्मविषयत्वं चाऽलिङ्गपर्यवसानम्।
अर्थ: सूक्ष्मता प्रकृति तक जाती है।
46. ता एव सबीजाः समाधयः।
अर्थ: ये बीजयुक्त समाधि हैं।
47. निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः।
अर्थ: निर्विचार समाधि से आत्मप्रसाद।
48. ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा।
अर्थ: सत्यधारिणी प्रज्ञा प्राप्त होती है।
49. श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्।
अर्थ: यह ज्ञान सामान्य ज्ञान से भिन्न है।
50. तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी।
अर्थ: यह संस्कार अन्य संस्कारों को नष्ट करता है।
51. तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः।
अर्थ: अंत में निर्बीज समाधि होती है।
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