पतंजलि योगसूत्र के अनुसार अस्मिता क्या है?
परिचय
महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में मनुष्य के दुःखों के पाँच प्रमुख कारण बताए हैं, जिन्हें क्लेश कहा जाता है। ये हैं—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। इनमें अस्मिता दूसरा क्लेश है।
अस्मिता का संबंध अहंकार से है। जब मनुष्य अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को भूलकर शरीर, मन, बुद्धि या पद-प्रतिष्ठा को ही "मैं" समझने लगता है, तब अस्मिता उत्पन्न होती है। यही अस्मिता मनुष्य को बंधन, दुःख और अशांति की ओर ले जाती है।
अस्मिता की परिभाषा
पतंजलि योगसूत्र (2.6) में कहा गया है:
"दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता"
अर्थात्—
द्रष्टा (पुरुष या आत्मा) और दर्शन शक्ति (बुद्धि या चित्त) को एक मान लेना ही अस्मिता है।
सरल शब्दों में कहें तो जब आत्मा और मन-बुद्धि के बीच का अंतर भूल जाता है, तब अस्मिता पैदा होती है।
अस्मिता कैसे उत्पन्न होती है?
अस्मिता का मूल कारण अविद्या है।
जब व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता, तब वह शरीर, मन और बुद्धि को ही अपना स्वरूप मान लेता है।
उदाहरण:
- मैं सुंदर हूँ।
- मैं विद्वान हूँ।
- मैं अमीर हूँ।
- मैं गरीब हूँ।
- मैं सफल हूँ।
- मैं असफल हूँ।
इन सभी धारणाओं में व्यक्ति स्वयं को किसी बाहरी पहचान से जोड़ लेता है। यही अस्मिता है।
अस्मिता के विभिन्न रूप
1. शरीर की अस्मिता
जब व्यक्ति शरीर को ही "मैं" मानता है, तब शरीर की सुंदरता, शक्ति या कमजोरी से उसका आत्ममूल्य प्रभावित होने लगता है।
2. बुद्धि की अस्मिता
ज्ञान और बुद्धिमत्ता पर अहंकार करना बुद्धि की अस्मिता है।
ऐसा व्यक्ति दूसरों को कम समझने लगता है।
3. धन और पद की अस्मिता
धन, प्रतिष्ठा, पद या सामाजिक स्थिति को अपनी पहचान बना लेना भी अस्मिता का रूप है।
4. आध्यात्मिक अस्मिता
कभी-कभी साधक अपने ज्ञान, साधना या आध्यात्मिक उपलब्धियों पर भी अहंकार करने लगता है।
यह भी अस्मिता का सूक्ष्म रूप है।
अस्मिता के दुष्परिणाम
अस्मिता के कारण:
- अहंकार बढ़ता है।
- दूसरों से तुलना होती है।
- क्रोध और ईर्ष्या उत्पन्न होती है।
- संबंधों में तनाव बढ़ता है।
- मन अशांत रहता है।
- आत्मज्ञान कठिन हो जाता है।
अहंकार जितना मजबूत होता है, आत्मा का अनुभव उतना ही कठिन हो जाता है।
आत्मा और अस्मिता का अंतर
योगदर्शन के अनुसार आत्मा शुद्ध, चेतन और साक्षी है।
आत्मा:
- जन्म नहीं लेती।
- मरती नहीं।
- बदलती नहीं।
- सदा मुक्त रहती है।
जबकि अस्मिता मन और बुद्धि की एक अवस्था है, जो अज्ञान के कारण उत्पन्न होती है।
अस्मिता को कैसे दूर करें?
1. साक्षीभाव का अभ्यास
अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को देखने का अभ्यास करें।
जब व्यक्ति स्वयं को विचारों का देखने वाला समझता है, तब अस्मिता कमजोर होने लगती है।
2. ध्यान
ध्यान मन को शांत करता है और आत्मा तथा मन के बीच का अंतर स्पष्ट करता है।
3. स्वाध्याय
योगसूत्र, भगवद्गीता और अन्य आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन विवेक को जागृत करता है।
4. ईश्वर-प्रणिधान
ईश्वर के प्रति समर्पण अहंकार को कम करता है।
समर्पण से "मैं करता हूँ" की भावना धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
5. विनम्रता
विनम्रता अस्मिता को कमजोर करने का सरल और प्रभावी उपाय है।
विनम्र व्यक्ति सीखने के लिए सदैव तैयार रहता है।
अस्मिता से मुक्ति का फल
जब अस्मिता कम होने लगती है:
- मन शांत होता है।
- संबंध बेहतर होते हैं।
- अहंकार घटता है।
- आत्मज्ञान का मार्ग खुलता है।
- साधक साक्षीभाव में स्थापित होने लगता है।
यही योग साधना का उद्देश्य है।
पतंजलि योगसूत्र के अनुसार अस्मिता वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति आत्मा और मन-बुद्धि को एक मान लेता है। यह अहंकार, तुलना, ईर्ष्या और दुःख का कारण बनती है। ध्यान, स्वाध्याय, साक्षीभाव, विनम्रता और ईश्वर-प्रणिधान के अभ्यास से अस्मिता को कम किया जा सकता है। जब अस्मिता समाप्त होती है, तब साधक अपने वास्तविक आत्मस्वरूप का अनुभव करने लगता है और मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ता है।
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