पतंजलि योगसूत्र के अनुसार द्वेष क्या है?
महर्षि पतंजलि ने योगदर्शन में पाँच प्रमुख क्लेशों का वर्णन किया है—अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। इनमें द्वेष चौथा क्लेश है।
जिस प्रकार सुखद अनुभवों के प्रति आकर्षण राग कहलाता है, उसी प्रकार दुःखद अनुभवों के प्रति उत्पन्न होने वाली घृणा, विरोध या नापसंदगी को द्वेष कहा जाता है। द्वेष मन को अशांत करता है और व्यक्ति को निरंतर मानसिक संघर्ष में बनाए रखता है।
द्वेष की परिभाषा
पतंजलि योगसूत्र (2.8) में कहा गया है:
"दुःखानुशयी द्वेषः"
अर्थात्—
दुःख के अनुभव के पीछे रहने वाली घृणा या विरोध की भावना द्वेष है।
जब किसी व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति या अनुभव से दुःख मिलता है, तो मन उसके प्रति नकारात्मक भाव विकसित कर लेता है। यही द्वेष है।
द्वेष कैसे उत्पन्न होता है?
द्वेष का मूल कारण भी अविद्या है।
जब व्यक्ति सुख चाहता है और दुःख से बचना चाहता है, तब वह सुखद वस्तुओं के प्रति राग और दुःखद वस्तुओं के प्रति द्वेष विकसित कर लेता है।
उदाहरण:
- किसी व्यक्ति द्वारा अपमानित किए जाने पर उसके प्रति घृणा।
- असफलता के कारण किसी कार्य से नफरत।
- किसी विशेष परिस्थिति से डर या विरोध।
- किसी समुदाय, विचारधारा या व्यक्ति के प्रति नकारात्मक भावना।
ये सभी द्वेष के विभिन्न रूप हैं।
द्वेष के प्रकार
1. व्यक्तियों के प्रति द्वेष
किसी व्यक्ति से हुए बुरे अनुभव के कारण उसके प्रति नफरत रखना।
2. परिस्थितियों के प्रति द्वेष
जीवन की कठिन परिस्थितियों को स्वीकार न कर पाना।
3. वस्तुओं के प्रति द्वेष
किसी वस्तु या स्थान से जुड़ी नकारात्मक स्मृति के कारण उससे दूरी बनाना।
4. विचारों के प्रति द्वेष
अपने विचारों से भिन्न विचारों को स्वीकार न करना।
5. स्वयं के प्रति द्वेष
अपनी गलतियों, कमियों या असफलताओं के कारण स्वयं से घृणा करना।
यह द्वेष का सबसे हानिकारक रूप माना जा सकता है।
द्वेष के दुष्परिणाम
द्वेष मन को भीतर से कमजोर करता है।
इसके कारण:
- क्रोध बढ़ता है।
- मानसिक तनाव उत्पन्न होता है।
- शांति नष्ट होती है।
- संबंध खराब होते हैं।
- ध्यान और एकाग्रता प्रभावित होती है।
द्वेष रखने वाला व्यक्ति अक्सर उसी स्मृति या घटना को बार-बार दोहराता रहता है, जिससे उसका दुःख और बढ़ जाता है।
राग और द्वेष का संबंध
राग और द्वेष एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
- जो पसंद है, उसके प्रति राग।
- जो नापसंद है, उसके प्रति द्वेष।
जब तक मन पसंद और नापसंद के बीच झूलता रहेगा, तब तक वह स्थिर नहीं हो सकता।
योग का उद्देश्य मन को इन दोनों से ऊपर उठाना है।
द्वेष को कैसे दूर करें?
1. साक्षीभाव
अपनी भावनाओं को बिना प्रतिक्रिया दिए देखना सीखें।
जब व्यक्ति अपने क्रोध और घृणा को देखने लगता है, तब उनका प्रभाव कम होने लगता है।
2. क्षमा
क्षमा द्वेष को समाप्त करने का शक्तिशाली साधन है।
क्षमा का अर्थ गलत कार्य को सही मानना नहीं, बल्कि स्वयं को मानसिक बोझ से मुक्त करना है।
3. ध्यान
ध्यान मन को शांत करता है और नकारात्मक भावनाओं की तीव्रता को कम करता है।
4. मैत्रीभाव
पतंजलि ने मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के भावों का अभ्यास करने की सलाह दी है।
मैत्रीभाव द्वेष को कम करने में सहायक होता है।
5. विवेक
यह समझना कि सभी अनुभव अस्थायी हैं और हर व्यक्ति अपनी सीमाओं और संस्कारों के अनुसार कार्य करता है, द्वेष को कम करने में मदद करता है।
द्वेष से मुक्ति का फल
जब द्वेष कम होने लगता है:
- मन हल्का महसूस करता है।
- क्रोध घटता है।
- संबंध बेहतर होते हैं।
- मानसिक शांति बढ़ती है।
- ध्यान गहरा होता है।
धीरे-धीरे साधक समत्व की अवस्था की ओर बढ़ने लगता है।
पतंजलि योगसूत्र के अनुसार द्वेष दुःखद अनुभवों के प्रति उत्पन्न होने वाली घृणा या विरोध की भावना है। यह मन को अशांत और बंधनग्रस्त बनाता है। साक्षीभाव, ध्यान, क्षमा, मैत्रीभाव और विवेक के अभ्यास से द्वेष को कम किया जा सकता है। जब द्वेष समाप्त होने लगता है, तब मन में शांति, संतुलन और आत्मज्ञान की संभावना बढ़ जाती है।
9229014554
0 Comments