पतंजलि योगसूत्र के अनुसार अभ्यास और वैराग्य क्या हैं?
महर्षि पतंजलि ने योग का लक्ष्य चित्तवृत्तियों का निरोध बताया है। लेकिन प्रश्न उठता है कि मन की चंचलता को कैसे रोका जाए?
इसका उत्तर पतंजलि योगसूत्र में स्पष्ट रूप से दिया गया है:
"अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः" (योगसूत्र 1.12)
अर्थात्—
अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चित्तवृत्तियों का निरोध होता है।
योगमार्ग में ये दोनों पंखों की तरह हैं। केवल अभ्यास पर्याप्त नहीं है और केवल वैराग्य भी पर्याप्त नहीं है। दोनों के संतुलन से ही साधक मन पर विजय प्राप्त कर सकता है।
अभ्यास क्या है?
पतंजलि योगसूत्र (1.13) में कहा गया है:
"तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः"
अर्थात्—
चित्त को स्थिर रखने का निरंतर प्रयास ही अभ्यास है।
जब साधक बार-बार मन को एकाग्र करने का प्रयास करता है, तब वह अभ्यास कर रहा होता है।
अभ्यास का अर्थ केवल योगासन करना नहीं है, बल्कि मन को बार-बार वर्तमान में लाना भी अभ्यास है।
अभ्यास की विशेषताएँ
पतंजलि कहते हैं:
"स तु दीर्घकाल नैरन्तर्य सत्कारासेवितो दृढभूमिः" (1.14)
अर्थात्—
जो अभ्यास लंबे समय तक, निरंतर और श्रद्धा के साथ किया जाए, वही स्थिर होता है।
अभ्यास के तीन आधार हैं:
1. दीर्घकाल
योग साधना कोई त्वरित परिणाम देने वाली प्रक्रिया नहीं है।
धैर्य आवश्यक है।
2. निरंतरता
रोज़ थोड़ा अभ्यास करना, कभी-कभी अधिक अभ्यास करने से बेहतर है।
3. श्रद्धा
विश्वास और सम्मान के साथ किया गया अभ्यास अधिक प्रभावी होता है।
वैराग्य क्या है?
पतंजलि योगसूत्र (1.15) में कहा गया है:
"दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्"
अर्थात्—
देखे और सुने हुए विषयों के प्रति तृष्णा का समाप्त होना वैराग्य है।
वैराग्य का अर्थ संसार छोड़ देना नहीं है।
वैराग्य का वास्तविक अर्थ है—
वस्तुओं का उपयोग करना, लेकिन उनसे बंधना नहीं।
वैराग्य के बारे में सामान्य भ्रम
बहुत से लोग समझते हैं कि वैराग्य का अर्थ घर-परिवार छोड़ देना है।
लेकिन पतंजलि ऐसा नहीं कहते।
योगदर्शन के अनुसार:
- वस्तुएँ समस्या नहीं हैं।
- आसक्ति समस्या है।
यदि मन किसी वस्तु से बंधा नहीं है, तो वह वैराग्य है।
अभ्यास और वैराग्य का संबंध
अभ्यास मन को एक दिशा देता है।
वैराग्य मन को बंधनों से मुक्त करता है।
उदाहरण:
यदि कोई व्यक्ति ध्यान करता है लेकिन संसार की इच्छाओं में अत्यधिक उलझा रहता है, तो उसका मन स्थिर नहीं होगा।
वहीं यदि कोई व्यक्ति वैराग्य की बात करता है लेकिन साधना नहीं करता, तो उसका विकास नहीं होगा।
इसलिए दोनों का संतुलन आवश्यक है।
अभ्यास और वैराग्य के लाभ
अभ्यास से
- एकाग्रता बढ़ती है।
- मन स्थिर होता है।
- ध्यान गहरा होता है।
- आत्मविश्वास बढ़ता है।
वैराग्य से
- इच्छाएँ कम होती हैं।
- मानसिक शांति बढ़ती है।
- भय और चिंता घटती है।
- स्वतंत्रता का अनुभव होता है।
दैनिक जीवन में अभ्यास और वैराग्य
- प्रतिदिन ध्यान करना — अभ्यास।
- परिणाम की चिंता छोड़ना — वैराग्य।
- नियमित स्वाध्याय करना — अभ्यास।
- प्रशंसा और आलोचना में समभाव रखना — वैराग्य।
- योगाभ्यास करना — अभ्यास।
- सफलता और असफलता से अत्यधिक प्रभावित न होना — वैराग्य।
अभ्यास और वैराग्य से चित्तवृत्ति निरोध
जब अभ्यास से मन स्थिर होता है और वैराग्य से आसक्तियाँ कम होती हैं, तब चित्त की वृत्तियाँ शांत होने लगती हैं।
यही योग की दिशा में वास्तविक प्रगति है।
धीरे-धीरे साधक साक्षीभाव में स्थापित होने लगता है और आत्मज्ञान के निकट पहुँचता है।
पतंजलि योगसूत्र के अनुसार अभ्यास और वैराग्य योग साधना के दो आधार स्तंभ हैं। अभ्यास मन को स्थिर करता है और वैराग्य मन को आसक्तियों से मुक्त करता है। दोनों का संतुलित विकास साधक को चित्तवृत्ति निरोध, ध्यान, समाधि और अंततः आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। इसलिए योगमार्ग पर चलने वाले प्रत्येक साधक के लिए अभ्यास और वैराग्य का महत्व अत्यंत आवश्यक है।
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