चित्त की पाँच वृत्तियाँ: पतंजलि योगदर्शन के अनुसार मन की गतिविधियों का रहस्य
प्रस्तावना
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में कहा है—
"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।" (योगसूत्र 1.2)
अर्थात् योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
यह सूत्र योगदर्शन का आधार है। लेकिन प्रश्न यह है कि चित्त क्या है और उसकी वृत्तियाँ कौन-सी हैं?
योगसूत्र में महर्षि पतंजलि बताते हैं कि चित्त की पाँच प्रकार की वृत्तियाँ होती हैं। ये वृत्तियाँ ही हमारे विचारों, भावनाओं, निर्णयों और अनुभवों का आधार बनती हैं।
चित्त क्या है?
योगदर्शन में चित्त केवल मन नहीं है। चित्त में मन, बुद्धि, अहंकार तथा स्मृति और संस्कारों का समग्र तंत्र सम्मिलित होता है।
जब चित्त किसी विषय के संपर्क में आता है, तब उसमें विभिन्न प्रकार की वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। इन्हीं के कारण मनुष्य संसार का अनुभव करता है।
चित्त की पाँच वृत्तियाँ
पतंजलि कहते हैं—
"प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः।" (योगसूत्र 1.6)
अर्थात् चित्त की पाँच वृत्तियाँ हैं—
1. प्रमाण
2. विपर्यय
3. विकल्प
4. निद्रा
5. स्मृति
आइए इन्हें विस्तार से समझते हैं।
1. प्रमाण
प्रमाण का अर्थ है सही या यथार्थ ज्ञान।
जब किसी वस्तु का ज्ञान वास्तविकता के अनुसार होता है, उसे प्रमाण कहते हैं।
उदाहरण—
आप सामने जलता हुआ दीपक देखते हैं और जानते हैं कि वह दीपक है। यह प्रमाण है।
पतंजलि के अनुसार प्रमाण तीन प्रकार से प्राप्त होता है—
- प्रत्यक्ष
- अनुमान
- आगम (विश्वसनीय प्रमाण)
2. विपर्यय
विपर्यय का अर्थ है गलत ज्ञान।
जब किसी वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप से भिन्न समझ लिया जाए, तो वह विपर्यय कहलाता है।
उदाहरण—
अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना।
वस्तु बदलती नहीं है, लेकिन हमारा ज्ञान गलत हो जाता है।
3. विकल्प
विकल्प वह ज्ञान है जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं होता।
यह केवल शब्दों, कल्पना या विचारों पर आधारित होता है।
उदाहरण—
आकाश में फूल (आकाश-कुसुम) की कल्पना।
ऐसी वस्तु वास्तव में नहीं होती, फिर भी मन उसकी कल्पना कर सकता है।
4. निद्रा
पतंजलि के अनुसार निद्रा भी चित्त की एक वृत्ति है।
जब मन किसी बाहरी विषय का अनुभव नहीं करता, तब भी चित्त निष्क्रिय नहीं होता।
गहरी नींद से जागने पर हम कहते हैं—
"आज बहुत अच्छी नींद आई।"
यह अनुभव बताता है कि निद्रा भी चित्त की एक अवस्था है।
5. स्मृति
स्मृति का अर्थ है पूर्व अनुभवों का पुनः स्मरण।
जो कुछ हमने देखा, सुना, सीखा या अनुभव किया है, वह संस्कार के रूप में चित्त में सुरक्षित रहता है।
उचित अवसर आने पर वही अनुभव स्मृति बनकर सामने आता है।
क्या इन वृत्तियों को समाप्त करना आवश्यक है?
पतंजलि का उद्देश्य इन वृत्तियों का नाश करना नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित और शांत करना है।
जब चित्त निरंतर इन वृत्तियों में उलझा रहता है, तब मन अशांत रहता है।
ध्यान, अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से साधक चित्त को स्थिर करता है। इसी अवस्था को चित्तवृत्ति निरोध कहा गया है।
चित्त और मन में अंतर
मन चित्त का एक भाग है।
- मन विचार करता है।
- बुद्धि निर्णय लेती है।
- अहंकार "मैं" की भावना उत्पन्न करता है।
- चित्त इन सभी का समग्र आधार है, जिसमें संस्कार और स्मृतियाँ भी संग्रहित रहती हैं।
इसलिए पतंजलि ने केवल मनोवृत्ति नहीं, बल्कि चित्तवृत्ति शब्द का प्रयोग किया है।
चित्त की पाँच वृत्तियाँ हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा हैं। इन्हीं के माध्यम से हम संसार को जानते, समझते और अनुभव करते हैं। योग का उद्देश्य इन वृत्तियों को दबाना नहीं, बल्कि उन्हें इतना शांत करना है कि साधक अपने वास्तविक स्वरूप का अनुभव कर सके।
जब चित्त शांत हो जाता है, तब आत्मा का प्रकाश स्वयं प्रकट होता है। यही पतंजलि योगदर्शन का वास्तविक संदेश है।
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