विपर्यय वृत्ति क्या है? पतंजलि योगदर्शन में गलत ज्ञान और भ्रम

विपर्यय वृत्ति क्या है? पतंजलि योगदर्शन में गलत ज्ञान और भ्रम


पतंजलि योगदर्शन में चित्त की पाँच वृत्तियों में दूसरी वृत्ति है विपर्यय।

महर्षि पतंजलि योगसूत्र में कहते हैं—

“विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्।”
— योगसूत्र 1.8

अर्थात् ऐसी मिथ्या जानकारी जो वस्तु के वास्तविक स्वरूप पर आधारित नहीं है, उसे विपर्यय कहा जाता है।

सरल शब्दों में, जब हम किसी वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप से अलग समझ लेते हैं, तब विपर्यय वृत्ति उत्पन्न होती है।

विपर्यय का अर्थ

‘विपर्यय’ का अर्थ है—उलटा ज्ञान, गलत समझ या भ्रम।

यह केवल सामान्य गलती नहीं है। यहाँ समस्या यह है कि चित्त किसी वस्तु के बारे में ऐसा ज्ञान बना लेता है जो उस वस्तु के वास्तविक स्वरूप के अनुरूप नहीं होता।

उदाहरण के लिए, अंधेरे में जमीन पर पड़ी रस्सी को देखकर किसी व्यक्ति को लगता है कि वहाँ साँप है।

वास्तविकता में वहाँ रस्सी है, लेकिन चित्त ने उसे साँप के रूप में ग्रहण कर लिया।

यही विपर्यय का प्रसिद्ध उदाहरण है।

रस्सी और साँप का उदाहरण

मान लीजिए शाम के समय एक व्यक्ति रास्ते से गुजर रहा है।

उसे थोड़ी दूरी पर एक वस्तु दिखाई देती है। प्रकाश कम होने के कारण वह उसे स्पष्ट रूप से नहीं देख पाता।

उसके मन में तुरंत विचार आता है—

“यह साँप है।”

वह डर जाता है और पीछे हट जाता है।

कुछ देर बाद प्रकाश पड़ने पर पता चलता है कि वह साँप नहीं, बल्कि एक रस्सी थी।

यहाँ वास्तविक वस्तु शुरू से ही रस्सी थी। परिवर्तन वस्तु में नहीं, बल्कि चित्त के ज्ञान में हुआ।

यही विपर्यय है।

विपर्यय कैसे उत्पन्न होता है?

गलत ज्ञान कई कारणों से उत्पन्न हो सकता है।

1. इंद्रियों की सीमा

हमारी इंद्रियाँ हर वस्तु को पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर सकतीं।

कम प्रकाश, अधिक दूरी, तेज गति या अन्य परिस्थितियाँ हमारी धारणा को प्रभावित कर सकती हैं।

2. पूर्व अनुभव

हमारे पुराने अनुभव वर्तमान अनुभव को प्रभावित कर सकते हैं।

यदि किसी व्यक्ति को पहले साँप से डर लगा हो, तो अंधेरे में कोई आकृति देखकर उसका चित्त जल्दी साँप की कल्पना कर सकता है।

3. भय

भय हमारी धारणा को प्रभावित कर सकता है।

जिस चीज से हम डरते हैं, कभी-कभी सामान्य वस्तु में भी उसी का आभास होने लगता है।

4. अधूरी जानकारी

जब किसी विषय की पूरी जानकारी हमारे पास नहीं होती, तो चित्त अधूरी जानकारी को अपने पुराने अनुभवों के आधार पर पूरा करने की कोशिश करता है।

विपर्यय और विकल्प में अंतर

विपर्यय और विकल्प देखने में समान लग सकते हैं, लेकिन दोनों अलग हैं।

विपर्यय में किसी वास्तविक वस्तु के बारे में गलत ज्ञान उत्पन्न होता है।

उदाहरण:

रस्सी को साँप समझना।

विकल्प में शब्द या कल्पना के आधार पर ऐसी धारणा बनती है जिसका वास्तविक वस्तु से आवश्यक संबंध नहीं होता।

उदाहरण:

“आकाश-कुसुम” अर्थात् आकाश में खिलने वाले फूल की कल्पना।

इसलिए—

विपर्यय = वास्तविक वस्तु के बारे में गलत ज्ञान।

विकल्प = शब्द या कल्पना पर आधारित ज्ञान।

क्या विपर्यय केवल बाहरी वस्तुओं में होता है?

नहीं।

योगदर्शन के अनुसार गलत ज्ञान हमारे स्वयं के बारे में भी हो सकता है।

उदाहरण के लिए—

हम शरीर को ही अपना पूर्ण अस्तित्व मान लेते हैं।

हम अपने विचारों को ही “मैं” समझ लेते हैं।

हम अपनी भावनाओं को अपनी वास्तविक पहचान मान लेते हैं।

हम धन, पद या सामाजिक पहचान को अपने अस्तित्व से जोड़ लेते हैं।

योगदर्शन की दृष्टि से ऐसी धारणाएँ भी आत्मज्ञान के मार्ग में भ्रम उत्पन्न कर सकती हैं।

अविद्या और विपर्यय

पतंजलि योगदर्शन में अविद्या को प्रमुख क्लेश माना गया है।

अविद्या का अर्थ केवल सामान्य जानकारी का अभाव नहीं है। यह वास्तविकता के स्वरूप को गलत ढंग से समझने की गहरी अवस्था है।

जब मनुष्य स्थायी और अस्थायी, शुद्ध और अशुद्ध, सुख और दुख तथा आत्मा और अनात्मा के बीच सही विवेक नहीं कर पाता, तब अज्ञान उत्पन्न होता है।

यही अज्ञान आगे चलकर अनेक प्रकार के भ्रम और मानसिक बंधनों का कारण बन सकता है।

विपर्यय से बचने का उपाय

योगदर्शन हमें केवल यह नहीं बताता कि गलत ज्ञान क्या है, बल्कि उससे ऊपर उठने का मार्ग भी दिखाता है।

विवेक

किसी भी अनुभव को तुरंत सत्य मान लेने के बजाय उसे देखने और समझने की क्षमता विकसित करना।

अभ्यास

ध्यान और आत्मनिरीक्षण का नियमित अभ्यास करना।

वैराग्य

हर विचार, भावना और अनुभव से अत्यधिक आसक्ति न रखना।

साक्षी भाव

अपने विचारों और भावनाओं को उनसे पूरी तरह जुड़ने के बजाय एक साक्षी की तरह देखना।

उदाहरण के लिए—

“मेरे भीतर क्रोध उत्पन्न हो रहा है”

यह कहना अधिक सजग दृष्टि है, बजाय इसके कि—

“मैं ही क्रोध हूँ।”

एक सरल ध्यान अभ्यास

शांत स्थान पर बैठें और अपनी श्वास को देखें।

कुछ समय बाद मन में कोई विचार आए तो उसे तुरंत सही या गलत घोषित न करें।

केवल देखें—

“एक विचार उत्पन्न हुआ।”

फिर वह विचार चला जाए तो देखें—

“विचार समाप्त हो गया।”

इस अभ्यास से धीरे-धीरे यह समझ विकसित होती है कि विचार और भावनाएँ आती-जाती हैं, लेकिन उन्हें देखने वाली जागरूकता उनसे अलग है।

योग के अंतिम लक्ष्य से संबंध

पतंजलि का उद्देश्य केवल गलत विचारों को हटाना नहीं है।

योग का उद्देश्य चित्त की सभी वृत्तियों को शांत करना है।

प्रमाण सही ज्ञान है, विपर्यय गलत ज्ञान है, विकल्प कल्पना है, निद्रा और स्मृति भी चित्त की वृत्तियाँ हैं।

जब साधक इन सभी वृत्तियों को समझने लगता है और अभ्यास तथा वैराग्य के माध्यम से चित्त को स्थिर करता है, तब आत्मस्वरूप के ज्ञान की दिशा खुलती है।


विपर्यय हमें यह महत्वपूर्ण शिक्षा देता है कि हमारा अनुभव हमेशा वास्तविकता के समान नहीं होता।

कभी-कभी वस्तु वही रहती है, लेकिन हमारा चित्त उसे अलग रूप में देखता है।

रस्सी में साँप दिखाई देना केवल एक उदाहरण है। जीवन में भी हमारी धारणाएँ, भय, इच्छाएँ और पुराने अनुभव वास्तविकता की हमारी समझ को प्रभावित कर सकते हैं।

योग हमें इन धारणाओं को दबाने के बजाय उन्हें देखना, समझना और उनसे परे जाना सिखाता है।

जब चित्त भ्रम से मुक्त होकर वास्तविकता को स्पष्ट रूप से देखता है, तब विवेक का उदय होता है। यही योग साधना की महत्वपूर्ण दिशा है।

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