पतंजलि योगसूत्र के अनुसार ईश्वर कौन है?
पतंजलि योगदर्शन को अक्सर एक व्यावहारिक आध्यात्मिक विज्ञान कहा जाता है। यद्यपि योगसूत्र का मुख्य उद्देश्य चित्तवृत्तियों का निरोध और आत्मज्ञान है, फिर भी महर्षि पतंजलि ने ईश्वर के विषय में भी महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए हैं।
पतंजलि का ईश्वर न तो केवल एक धार्मिक अवधारणा है और न ही किसी विशेष संप्रदाय तक सीमित है। योगसूत्र में ईश्वर को एक विशेष पुरुष कहा गया है, जो क्लेशों, कर्मों और उनके परिणामों से पूर्णतः मुक्त है।
ईश्वर की परिभाषा
पतंजलि योगसूत्र (1.24) में कहा गया है:
"क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः"
अर्थात्—
ईश्वर वह विशेष पुरुष है जो क्लेश, कर्म, कर्मफल और संस्कारों से कभी स्पर्शित नहीं होता।
सामान्य जीव अविद्या, राग, द्वेष और कर्मों के बंधन में रहता है, जबकि ईश्वर इन सब से परे है।
ईश्वर क्यों विशेष है?
योगदर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव चेतन है, लेकिन जीव और ईश्वर में अंतर है।
जीव:
- अज्ञान से प्रभावित हो सकता है।
- कर्म करता है।
- कर्मफल भोगता है।
- जन्म और मृत्यु के चक्र में रहता है।
ईश्वर:
- पूर्णतः शुद्ध है।
- कर्मबंधन से मुक्त है।
- सर्वज्ञ है।
- कभी अज्ञान से प्रभावित नहीं होता।
इसी कारण पतंजलि ईश्वर को "पुरुषविशेष" कहते हैं।
ईश्वर सर्वज्ञ है
पतंजलि योगसूत्र (1.25) में कहा गया है:
"तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्"
अर्थात्—
ईश्वर में सर्वज्ञता का बीज सर्वोच्च रूप में विद्यमान है।
ईश्वर का ज्ञान सीमित नहीं है। वह समय, स्थान और परिस्थितियों की सीमाओं से परे है।
ईश्वर आदि गुरु है
पतंजलि योगसूत्र (1.26) में कहा गया है:
"स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्"
अर्थात्—
ईश्वर काल से सीमित न होने के कारण प्राचीनतम गुरुओं का भी गुरु है।
सभी ज्ञान का अंतिम स्रोत ईश्वर ही है।
ईश्वर का प्रतीक – प्रणव (ॐ)
पतंजलि योगसूत्र (1.27) में कहा गया है:
"तस्य वाचकः प्रणवः"
अर्थात्—
ईश्वर का वाचक (प्रतीक) प्रणव अर्थात् ॐ है।
योगदर्शन में ॐ को अत्यंत पवित्र माना गया है।
यह केवल ध्वनि नहीं, बल्कि चेतना का प्रतीक है।
ॐ का जप और ईश्वर का चिंतन
पतंजलि योगसूत्र (1.28) में कहा गया है:
"तज्जपस्तदर्थभावनम्"
अर्थात्—
ॐ का जप और उसके अर्थ का चिंतन करना चाहिए।
सिर्फ शब्दों का उच्चारण पर्याप्त नहीं है।
साधक को उसके गहरे आध्यात्मिक अर्थ का भी चिंतन करना चाहिए।
ईश्वर-प्रणिधान क्या है?
योगसूत्र में ईश्वर-प्रणिधान को महत्वपूर्ण साधना माना गया है।
ईश्वर-प्रणिधान का अर्थ है—
- ईश्वर के प्रति समर्पण।
- अहंकार का त्याग।
- कर्मों के फल को ईश्वर को अर्पित करना।
- दिव्य चेतना पर विश्वास रखना।
जब साधक समर्पण की भावना विकसित करता है, तब उसका मन हल्का और शांत होने लगता है।
ईश्वर-प्रणिधान के लाभ
पतंजलि के अनुसार ईश्वर-प्रणिधान से:
- मन की एकाग्रता बढ़ती है।
- अहंकार कम होता है।
- साधना सरल होती है।
- मानसिक शांति प्राप्त होती है।
- समाधि की प्राप्ति में सहायता मिलती है।
पतंजलि के ईश्वर और धार्मिक मान्यताएँ
पतंजलि योगसूत्र किसी विशेष धर्म या पूजा-पद्धति पर जोर नहीं देता।
योगदर्शन में ईश्वर एक सार्वभौमिक चेतना है, जिसे साधक अपने विश्वास के अनुसार समझ सकता है।
इसलिए योग का मार्ग सभी के लिए खुला है।
साधना में ईश्वर का महत्व
यद्यपि योगमार्ग में अभ्यास और वैराग्य महत्वपूर्ण हैं, फिर भी ईश्वर-प्रणिधान साधना को सरल बना सकता है।
जब व्यक्ति केवल अपने प्रयासों पर निर्भर रहता है, तो अहंकार उत्पन्न हो सकता है।
लेकिन समर्पण की भावना उसे विनम्र और संतुलित बनाए रखती है।
पतंजलि योगसूत्र के अनुसार ईश्वर एक विशेष पुरुष है जो क्लेश, कर्म और संस्कारों से पूर्णतः मुक्त है। वह सर्वज्ञ, शाश्वत और आदि गुरु है। ॐ ईश्वर का प्रतीक माना गया है और ईश्वर-प्रणिधान योग साधना का महत्वपूर्ण अंग है। समर्पण, श्रद्धा और ईश्वर चिंतन के माध्यम से साधक अपने मन को शांत कर सकता है और आत्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
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